India – US Trade War Explained: WTO, Free Trade Agreement, कृषि विवाद, GM बीज और ट्रंप–बाइडन दौर की पूरी कहानी

भारत और अमेरिका के रिश्ते बाहर से जितने दोस्ताना दिखते हैं, अंदर से उतने ही जटिल हैं। मंचों पर “रणनीतिक साझेदारी”, “इंडो-पैसिफिक सहयोग” और “डेमोक्रेटिक वैल्यूज़” की बातें होती हैं, लेकिन जब व्यापार की बारी आती है, तो दोनों देशों के हित अक्सर टकराते हैं। खासकर कृषि, दवाइयों, टेक्नोलॉजी और आयात-निर्यात शुल्क (tariff) जैसे मुद्दों पर।

भारत–अमेरिका के बीच जो आज हम “ट्रेड टेंशन” या “ट्रेड वॉर” की बात करते हैं, वह अचानक शुरू नहीं हुआ। इसकी जड़ें विश्व व्यापार व्यवस्था, मुक्त व्यापार समझौतों और दशकों पुराने विवादों में छिपी हैं।

WTO: World Trade व्यवस्था की शुरुआत

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने महसूस किया कि अगर देशों के बीच व्यापार नियमबद्ध न हुआ, तो टकराव बढ़ेगा। इसी सोच से पहले GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) बना और बाद में 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना हुई।

WTO का मूल उद्देश्य

  • देशों के बीच व्यापार बाधाएं कम करना
  • आयात–निर्यात पर नियम तय करना
  • विवाद समाधान का मंच देना
  • गरीब और विकासशील देशों को वैश्विक बाजार से जोड़ना

कागज़ों में WTO “समान अवसर” की बात करता है, लेकिन हकीकत में विकसित देशों को यहां हमेशा ज्यादा ताकत मिली।

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA): विचार और वास्तविकता

WTO के समानांतर देशों ने Free Trade Agreements (FTA) बनाने शुरू किए। इसका विचार सरल था— दो देश आपस में तय कर लें कि वे एक-दूसरे के सामान पर कम टैक्स लगाएंगे।

FTA कैसे काम करता है?

  • कुछ सेक्टर पूरी तरह खोल दिए जाते हैं
  • कुछ को चरणबद्ध तरीके से खोला जाता है
  • संवेदनशील क्षेत्रों (जैसे कृषि) में शर्तें लगती हैं

समस्या यहीं से शुरू होती है। विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने बाजार खोलें, लेकिन खुद सब्सिडी और संरक्षण जारी रखते हैं।

भारत–अमेरिका व्यापार संबंध: शुरुआती दौर

भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद तेज़ हुए।

1990 के बाद

  • भारत ने आयात शुल्क (Import Tax) घटाए
  • विदेशी निवेश के दरवाज़े खोले
  • IT और फार्मा सेक्टर में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी

लेकिन भारत ने कृषि क्षेत्र को पूरी तरह नहीं खोला, और यही अमेरिका को सबसे ज्यादा खटकता रहा।

PL-480: “गेहूं से कूटनीति” की पुरानी कहानी

भारत–अमेरिका कृषि तनाव नया नहीं है।

1960 के दशक में अमेरिका ने भारत को PL-480 (Public Law 480) के तहत गेहूं दिए। इसे “Food for Peace” कहा गया, लेकिन असल में यह अमेरिका की कृषि डंपिंग नीति थी।

PL-480 का असर

  • भारत अमेरिकी गेहूं पर निर्भर हुआ
  • स्थानीय किसानों को नुकसान
  • भारत को अहसास हुआ कि खाद्य सुरक्षा रणनीतिक मुद्दा है

यहीं से भारत ने तय किया कि कृषि आत्मनिर्भरता से समझौता नहीं होगा

कृषि व्यापार (Agriculture Trade) असली टकराव की जड़

अमेरिका चाहता है कि:

  • भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों को खुले बाजार में आने दे
  • डेयरी, मक्का, सोया, सेब, बादाम पर शुल्क घटाए
  • GM (Genetically Modified) फसलों को अनुमति दे

भारत का पक्ष:

  • 60% से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर
  • छोटे और सीमांत किसान टिक नहीं पाएंगे
  • अमेरिकी कृषि भारी सब्सिडी पर चलती है

अगर भारत अमेरिकी कृषि खोलता है, तो भारतीय किसान टिक नहीं पाएंगे

GM (Genetically Modified) बीज विवाद

भारत में GM बीजों की बहस सिर्फ विज्ञान की नहीं, किसानों की आज़ादी की भी है।

Bt Cotton का मामला

2000 के दशक में Monsanto की Bt Cotton कीटनाशक भारत में आई।

शुरुआत में:

  • उत्पादन बढ़ा
  • कीट कम हुए

कुछ साल बाद:

  • बीज महंगे
  • किसानों की Monsanto के बीज पर निर्भरता
  • नई कीट समस्याएं

यहीं से भारत में GM बीजों को लेकर अविश्वास गहराया।

अन्य देशो में GM बीजों के दुष्परिणाम

अकेले भारत में नहीं अन्य देशो में भी GM बीजों को लेकर अविश्वास गहराया।

अर्जेंटीना

  • GM सोया पर अत्यधिक निर्भरता
  • स्थानीय विविधता खत्म
  • बड़ी कंपनियों का नियंत्रण

ब्राज़ील

  • निर्यात बढ़ा
  • छोटे किसान हाशिए पर

अफ्रीकी देश

  • बीज आयात पर निर्भर
  • खाद्य संप्रभुता कमजोर

इन उदाहरणों ने भारत को सतर्क बना दिया।

ट्रंप का पहला कार्यकाल: “America First” और व्यापार युद्ध (Trade War)

2016 में डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए और वैश्विक व्यापार की भाषा बदल गई।

ट्रंप की सोच

  • व्यापार घाटा = नुकसान
  • संरक्षणवाद
  • दबाव की राजनीति

चीन के बाद ट्रंप की नजर भारत पर पड़ी।

भारत पर ट्रंप का दबाव

प्रमुख मुद्दे

  • कृषि बाजार खोलो
  • मेडिकल डिवाइस की कीमतें बढ़ाने दो
  • Harley-Davidson पर टैक्स घटाओ

2019 में ट्रंप ने भारत से GSP (Generalized System of Preferences) वापस ले लिया।

GSP हटने का मतलब

  • भारतीय निर्यात महंगा
  • खासकर MSME सेक्टर को नुकसान

यह साफ संकेत था कि दोस्ती अपनी जगह है, व्यापार अपनी।

बाइडन कार्यकाल: भाषा बदली, नीति नहीं

2021 में जो बाइडन आए।

बातचीत नरम हुई:

  • “Rules-based order”
  • “Strategic partnership”

लेकिन:

  • कृषि पर अमेरिकी रुख नहीं बदला
  • GM फसलों पर दबाव बना रहा
  • WTO में सब्सिडी मुद्दे जस के तस

बाइडन सरकार ने टकराव कम किया, लेकिन मांगें वही रहीं।

ट्रंप का दूसरा कार्यकाल: भारत पर असर

ट्रंप दोबारा सत्ता में आए और

  • कृषि बाजार खोलने का सीधा दबाव
  • टैरिफ युद्ध की वापसी

भारत के लिए चुनौती होगी

  • रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक हितों में संतुलन
  • चीन से दूरी और अमेरिका से नजदीकी के बीच समझदारी

भारत की रणनीति: कृषि पर समझौता नहीं

भारत जानता है:

  • कृषि सिर्फ व्यापार नहीं, सामाजिक स्थिरता है
  • किसान असंतोष राजनीतिक अस्थिरता ला सकता है
  • खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा है

इसीलिए भारत WTO में:

  • MSP का बचाव करता है
  • सार्वजनिक भंडारण नीति पर अड़ा रहता है

यह युद्ध नहीं, हितों की टकराहट है

भारत–अमेरिका के बीच जो कुछ हो रहा है, वह पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि हितों की खींचतान है।

अमेरिका:

  • अपने किसानों और कंपनियों के लिए बाजार चाहता है

भारत:

  • अपने किसानों और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देता है

इतिहास बताता है कि भारत ने जब-जब कृषि में आत्मनिर्भरता छोड़ी, नुकसान हुआ। इसलिए चाहे दबाव अमेरिका का हो या किसी और का, भारत के लिए कृषि समझौता सिर्फ आर्थिक नहीं, सभ्यतागत निर्णय है।

आने वाले वर्षों में रिश्ते और गहरे होंगे, लेकिन यह टकराव बना रहेगा— क्योंकि वैश्विक व्यापार में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित होते हैं।

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